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Category Archives: Negotiable Instruments Act

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परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 – Negotiable Instruments Act, 1881

परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 या ‘विनिमय साध्य विलेख नियम 1881’ (Negotiable Instruments Act, 1881) भारत का एक कानून है जो पराक्रम्य लिखत (प्रॉमिजरी नोट, बिल्ल ऑफ एक्सचेंज तथा चेक आदि) से सम्बन्धित है।

चेक बाउंस होने पर क्या करें: जानिए पूरी कानूनी प्रक्रिया

चेक एक परक्राम्य लिखत या दस्तावेज (negotiable instrument) है, जिसके तहत बिना किसी शर्त के एक निश्चित धनराशि का भुगतान करने का वादा किया जाता है या आदेश दिया जाता हैl रेखांकित चेक (crossed cheque) और खाता से भुगतान होने वाले चेक (account payee cheque) द्वारा केवल उसी व्यक्ति को धनराशि का भुगतान किया जाता है, जिसका नाम प्राप्तकर्ता के रूप में चेक पर लिखा रहता हैl ऐसे चेक को प्राप्तकर्ता के बैंक खाते में जमा करना पड़ता है|

कानूनी रूप से चेक के मालिक को “चेक काटने वाला” या “चेकदाता” या “चेक जारीकर्ता” (Drawer) कहा जाता है, जिसके पक्ष में चेक तैयार किया जाता है उसे “प्राप्तकर्ता” (Payee) कहा जाता है और जिस बैंक को धनराशि का भुगतान करने के लिए निर्देशित किया जाता है, उसे “भुगतानकर्ता” (Drawee) कहा जाता हैl

हाल के दिनों में चेक बाउंस की घटनाएँ आम हो गई है। कभी-कभी बड़ी धनराशि वाले चेक का भुगतान नहीं हो पाता है और उन बैंकों को चेक वापस कर दिया जाता है, जिन्होंने इसे तैयार किया होता है|

नीचे दिए गए लेख में इस बात की जानकारी प्रदान की गई है कि यदि आपका चेक अस्वीकृत हो गया है तो आप क्या कर सकते हैं? इसके साथ ही चेक के अस्वीकृत होने पर आपको किन-किन कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ेगा, उसके बारे में चरणबद्ध विवरण दिया गया हैl

चेक अस्वीकृत होने पर उठाए जाने वाले कदम

जब एक चेक अस्वीकृत हो जाता है तो भुगतानकर्ता बैंक (Drawee Bank) तुरंत ही “प्राप्तकर्ता” (Payee) के बैंक को “चेक रिटर्न मेमो” जारी करता है और भुगतान न करने का कारण बताता हैl इसके बाद “प्राप्तकर्ता” (Payee) का बैंक “प्राप्तकर्ता” (Payee) को अस्वीकृत चेक और “चेक रिटर्न मेमो” सौंप देता हैl यदि धारक या प्राप्तकर्ता को यह लगता है कि दूसरी बार चेक को जमा करने पर उसे स्वीकार कर लिया जाएगा तो वह उस तारीख के तीन महीनों के भीतर पुनः चेक को जमा कर सकता हैl लेकिन यदि चेक जारीकर्ता दूसरी बार भी भुगतान करने में विफल रहता है तो धारक या प्राप्तकर्ता को चेक जारीकर्ता के विरूद्ध कानूनी तौर पर मुकदमा दर्ज कराने का अधिकार प्रदान किया गया है।

प्राप्तकर्ता (Payee) चेक अस्वीकृत होने पर डिफॉल्टर/चेक जारीकर्ता के विरूद्ध कानूनी रूप से तभी मुकदमा कर सकता है यदि चेक में उल्लिखित राशि ऋण या किसी अन्य देनदारी के भुगतान के लिए डिफॉल्टर/चेक जारीकर्ता द्वारा प्राप्तकर्ता के लिए जारी किया गया हैl

कानूनी कार्रवाई

चेक अस्वीकृत होने से संबंधित मामलों की जांच परक्राम्य लिखत अधिनियम (The Negotiable Instruments Act), 1881 के अंतर्गत की जाती हैl 1881 के बाद से इस अधिनियम को कई बार संशोधित किया गया हैl

इस अधिनियम की धारा 138 के अनुसार चेक का अस्वीकृत होना एक दंडनीय अपराध है और इसके लिए दो साल का कारावास या जुर्माना या दोनों हो सकते हैंl

यदि चेक प्राप्तकर्ता कानूनी कार्यवाही करने का निर्णय लेता है तो पहले चेक जारीकर्ता को तुरंत चेक की राशि चुकाने का मौका देना चाहिए। इस तरह का एक मौका केवल लिखित रूप से नोटिस के रूप में देना चाहिए।

प्राप्तकर्ता (Payee), बैंक से “चेक रिटर्न मेमो” प्राप्त करने की तारीख से 30 दिन के अंदर चेक जारीकर्ता को नोटिस भेज सकता हैl इस नोटिस में यह बात का उल्लेख अवश्य करना चाहिए कि चेक जारीकर्ता को नोटिस प्राप्ति की तारीख से 15 दिनों के अंदर प्राप्तकर्ता को चेक की राशि का भुगतान करना होगा। यदि चेक जारीकर्ता नोटिस प्राप्त करने के 30 दिनोंके भीतर भुगतान करने में विफल रहता है, तो प्राप्तकर्ता (Payee) परक्राम्य लिखत अधिनियम (The Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत उसके खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकता हैl

अभियोजन पक्ष (prosecution) के लिए शर्तें

कानूनी रूप से धारा 138 के प्रावधानों का उपयोग करने के लिए अभियोजन पक्ष को निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना आवश्यक है:

1. “चेक जारीकर्ता” (Drawer) ने अपने नाम से चल रहे खाते से चेक जारी किया हो|

2.“चेक जारीकर्ता” (Drawer) के खाते में अपर्याप्त धनराशि के कारण चेक को लौटाया या अस्वीकार किया गया हो|

3. चेक को किसी ऋण या कानूनी दायित्व को पूरा करने के लिए जारी किया गया है।

नोटिस प्राप्त करने के बाद अगर चेक जारीकर्ता नोटिस प्राप्त करने के दिन से 15 दिनों के भीतर भुगतान नहीं करता है, तो वह परक्राम्य लिखत अधिनियम (The Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत दंडनीय अपराध करता है।

सजा और जुर्माना

इस मामले से संबंधित हलफनामा और जरूरी कागजातों के साथ शिकायत प्राप्त करने पर अदालत सम्मन (summon) जारी करेगी और मामले की सुनवाई करेगी| यदि दोष सिद्ध हो जाता है, तो डिफॉल्टर को जुर्माने की राशि के रूप में चेक में अंकित राशि से दुगुना वसूला जा सकता है या दो साल की कैद हो सकती है या जुर्माना और कैद दोनों हो सकती हैl इसके साथ ही किसी व्यक्ति द्वारा जारी किया चेक बार-बार बाउंस हो जाता है बैंक उस व्यक्ति को चेक बुक की सुविधा से वंचित कर सकती है और उसके खाते को भी बंद कर सकती है।

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